The Samachar Express| 21 फरवरी 2026 | Ranjeet Jha: नमस्कार, पाठकों! देश समाचार एक्सप्रेस की इस विशेष रिपोर्ट में हम दो महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं, जो भारत के लोकतंत्र और संघीय व्यवस्था को सीधे प्रभावित करते हैं। पहला मुद्दा है चुनाव आयुक्तों को मिली लाइफटाइम इम्यूनिटी पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही याचिका, और दूसरा है पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस कुरियन जोसेफ की कमिटी द्वारा दी गई रिपोर्ट, जो केंद्र-राज्य संबंधों में सुधार की मांग करती है। यह रिपोर्ट उन विवादों पर आधारित है जो लंबे समय से चल रहे हैं और देश की राजनीतिक बहस को नई दिशा दे सकती है। हमारी रिपोर्ट तथ्यों पर आधारित है और विभिन्न स्रोतों से जुटाई गई जानकारी का उपयोग करती है।1. चुनाव आयुक्तों की लाइफटाइम इम्यूनिटी पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई: याचिका वापस ली गई?भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों (ECs) को 2023 के नए कानून के तहत मिली लाइफटाइम इम्यूनिटी पर सवाल उठाने वाली एक महत्वपूर्ण याचिका सुप्रीम कोर्ट में थी। यह याचिका एनजीओ लोक प्रहरी द्वारा दाखिल की गई थी, जिसके महासचिव रिटायर्ड आईएएस एस.एन. शुक्ला हैं।
याचिका में चैलेंज किया गया था कि चीफ इलेक्शन कमिश्नर एंड अदर इलेक्शन कमिश्नर्स (अपॉइंटमेंट, कंडीशंस ऑफ सर्विस एंड टर्म ऑफ ऑफिस) एक्ट, 2023 की सेक्शन 16, जो CEC और ECs को उनके आधिकारिक कार्यों में की गई गलतियों के लिए सिविल या क्रिमिनल कार्यवाही से स्थायी छूट देती है।
कानून की मुख्य प्रावधान: सेक्शन 16 कहती है कि "कोई भी कोर्ट CEC या EC के खिलाफ कोई सिविल या क्रिमिनल केस नहीं चला सकता, अगर वह उनके आधिकारिक ड्यूटी से जुड़ा हो।" याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह "अप्रत्याशित और अनियंत्रित पावर" देता है, जो राष्ट्रपति या गवर्नर को भी नहीं मिली है।
यह छूट लाइफटाइम के लिए है, यानी रिटायरमेंट के बाद भी।
सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई: जनवरी 2026 में, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया था। बेंच में CJI सूर्या कांत और जस्टिस जोयमल्या बागची शामिल थे।
लेकिन 20 फरवरी 2026 को हुई सुनवाई में, CJI सूर्या कांत ने याचिका को "एब्सोल्यूटली एब्सर्ड" बताते हुए कहा कि यह ठीक से तैयार नहीं की गई है और इसमें कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं हुआ।
याचिकाकर्ता के वकील ने याचिका वापस ले ली, और कोर्ट ने कहा कि इसे सुधार कर दोबारा दाखिल किया जा सकता है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि पहले संबंधित अथॉरिटी से संपर्क करें।
यह फैसला विवादास्पद है क्योंकि पहले नोटिस जारी होने से लग रहा था कि कोर्ट इस मुद्दे पर गंभीर है। लेकिन अब यह ठंडे बस्ते में चली गई लगती है। विपक्षी दलों का कहना है कि यह कानून चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है, खासकर जब CEC ज्ञानेश कुमार और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति पर पहले से विवाद चल रहा है।
यह कानून मार्च 2023 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आया, जिसमें CEC/ECs की नियुक्ति के लिए CJI को कमिटी में शामिल करने का निर्देश था, लेकिन सरकार ने इसे बदल दिया।
यह मुद्दा लोकतंत्र की जवाबदेही से जुड़ा है। अगर चुनाव आयुक्त गलतियां करेंगे तो उन्हें कोई सजा नहीं मिलेगी? यह सवाल अब भी अनुत्तरित है।2. कुरियन जोसेफ कमिटी की रिपोर्ट: फेडरलिज्म में "स्ट्रक्चरल रीसेट" की मांगतमिलनाडु सरकार द्वारा अप्रैल 2025 में गठित हाई-लेवल कमिटी ने केंद्र-राज्य संबंधों पर अपनी पहली रिपोर्ट 16 फरवरी 2026 को मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन को सौंपी।
कमिटी की अध्यक्षता रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस कुरियन जोसेफ कर रहे हैं, और सदस्य हैं रिटायर्ड आईएएस के. अशोक वर्धन शेट्टी और डॉ. एम. नागनाथन।
18 फरवरी को इसे तमिलनाडु विधानसभा में रखा गया।
387 पेज की यह रिपोर्ट "क्रिपिंग सेंट्रलाइजेशन" (धीमी केंद्रीकरण) की आलोचना करती है और राज्य स्वायत्तता को मजबूत करने के लिए संवैधानिक बदलाव सुझाती है।
मुख्य मुद्दे और सुझाव:गवर्नर की भूमिका: कमिटी ने गवर्नरों की "ओवररीच" पर फोकस किया। सुझाव: अनुच्छेद 155 में बदलाव - राष्ट्रपति राज्य विधानसभा द्वारा बहुमत से मंजूर तीन नामों में से एक को गवर्नर नियुक्त करें।
5 साल का फिक्स्ड टर्म, "प्लेजर डॉक्ट्रिन" खत्म। बिलों पर 15 दिन में फैसला, देरी पर "डीम्ड असेंट"।
गवर्नर को आगे सिर्फ राष्ट्रपति या वाइस-प्रेसिडेंट का पद मिले। विवादास्पद उदाहरण: तमिलनाडु, केरल, पंजाब में गवर्नर बिलों को रोकते हैं।
वन नेशन वन लैंग्वेज: पूरी तरह खारिज।
अनुच्छेद 343 में इंग्लिश को हमेशा आधिकारिक भाषा बनाएं। अनुच्छेद 345 से "या हिंदी" हटाएं। ट्राइलिंगुइज्म से बाइलिंगुइज्म (इंग्लिश + रीजनल) पर शिफ्ट।
53 भाषाओं को हिंदी की बोलियां बताना गलत।
अन्य सुझाव: अनुच्छेद 368 में बदलाव - ज्यादातर संशोधनों के लिए आधे राज्यों की मंजूरी।
डेलिमिटेशन फ्रीज तक 2126 या जब तक फर्टिलिटी रेट्स एक समान न हों।
शिक्षा को स्टेट लिस्ट में वापस। वन नेशन वन इलेक्शन खारिज। जीएसटी में राज्यों को ज्यादा हिस्सा।
रिपोर्ट कहती है कि भारत की संघीय व्यवस्था को 1991 के आर्थिक सुधारों जैसा "स्ट्रक्चरल रीसेट" चाहिए।
स्टालिन ने कहा कि यह रिपोर्ट देशभर में बहस शुरू करेगी और फेडरलिज्म को बचाएगी।
रिपोर्ट तमिल और अंग्रेजी में उपलब्ध है, और तमिल वर्जन ओपन एक्सेस है।
निष्कर्ष: लोकतंत्र और फेडरलिज्म पर खतरा?ये दोनों मुद्दे दिखाते हैं कि केंद्र की बढ़ती ताकत और संस्थाओं की जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं। चुनाव आयुक्तों की इम्यूनिटी से निष्पक्ष चुनाव पर असर पड़ सकता है, जबकि कुरियन रिपोर्ट राज्य अधिकारों की रक्षा की मांग करती है। मुख्यमंत्री स्टालिन का कहना है कि "संघ मजबूत तभी होगा जब राज्य मजबूत होंगे।"
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